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Saturday, 16 May 2020

मजबूर : मजदूर ( A fight of Corona migrants )

मजबूर : मजदूर



छोड़ के गावं के घर 
जिस तरह शहर आये थे हम 
आज कुछ उसी तरह 
वैसे ही वापिस जा रहे हैं हम


 बस फर्क इतना है 
तब विदा करती आँखों में ख़ुशी के आसूं थे 
और अब इस दुःख की घड़ी में 
लड़खड़ाते क़दमों के दर्द भरे आंसू हैं 


किसी ने नही सोचा एक पल के लिए भी 
जिनके सपनो का घर हमने सजाया था
 जिनके घरों की दीवारों को हमने रंगा था
 दो वक़्त की रोटी या सर पे छत हो
 किसी ने नही सोचा एक पल लिए भी 


किसी ने नही देखा मुड़ कर एक नज़र भी 
किसके काम करने से ये देश दौड़ता है 
किसी ने नहीं पूछा एक पल के लिए भी 
क्या परिवार सिर्फ बातों और वादों से पलता है 


क्या किसी ने सोचा उस सड़क पर चलने वालों का भी खून दौड़ता है ?


ये दुनिया दो रंगो में बनी है
एक तरफ तो सड़कें भी रेशम से सजी हैं 
और दूसरी तरफ आधी दुनिया जिस्म से नंगी है 
कैसे भरोसा होगा मनुष्य को इंसानियत पर 
क्यूंकि यहाँ कुछ हवामहलों में बैठे निर्णय लेने वाली हस्ती हैं..


कुछ तो गड़बड़ी है सोच में उनकी या हमारी
एक तरफ उड़न तश्तरियां जान बचाती हैं 
और दूसरी तरफ कोई इज़्ज़त नहीं है हमारी 

ये भेद - भाव दौलत का है साहब
मेहनत की चिंता होती तो कदर होती आज हमारी 


ये ह्रदय थोड़ा मजबूत रहा है अपना 
जो आगे भी पग - पग पे गलतियां माफ़ करता जायेगा 
बस थोड़ा ध्यान रखना सभी अपना 
मजदूर तो पहियाँ है देश का फिर से यूँ ही चलता जायेगा 


Harshvardhan Sharma©




Friday, 27 March 2020

वक़्त ने ठानी है!!!

वक़्त ने ठानी है!!!




कुछ इस तरह नज़र लगी ,
उजियारे में भी अंधेरा छा गया
 की हरी घास में शबनम अभी बची थी,
 एक तिनका ऐसा जला पूरे संसार में हलचल मचा गया



 एक एक कण में जो ,
हमने गंदगी फैलाई थी 
कुछ इस तरह रुख बदला हवाओ ने ,
जैसे मनुष्यों से इनकी कई जन्मों से लड़ाई थी 



जो करते थे राज़ पूरे जगत में
 वो खुद आज पिंजरे में कैद हो गए,
 और जिन बेजुबानो को घर से दूर किया था,
 वो आज खुले आसमान तले मुस्तैद हो गए




 तो हालात कुछ इस तरह है,
 हम बेचैनी के समुन्दर किनारे बैठे हैं,
 खुशियों की कश्तियों का इंतज़ार है ,
अब तो बस उम्मीद भरी आँखें लिये बैठे हैं



 ये मौका मिला है खूबसूरत ,
परिवार के संग बिताने का,
 यही तो वक़्त है अपना,
 घर बैठ कर दुनिया के लिए कुछ कर जाने का ..


-Harshvardhan Sharma 






मजबूर : मजदूर ( A fight of Corona migrants )

मजबूर : मजदूर छोड़ के गावं के घर  जिस तरह शहर आये थे हम  आज कुछ उसी तरह  वैसे ही वापिस जा रहे हैं हम  बस फर्क इतना है ...