कौन है मदारी यहाँ कौन है जमूरा
कुर्सी पर एक 'मौन' को बैठाया,
उसे समझ बैठा मैं बादशाह,
पर कुछ दिनों बाद दुःख हुआ ,
देख के उसकी दुर्दशा
सेवा का वादा करके,
वो खुद मेवा खा गया ,
राजा वो खुद बना ,
मुझे प्यादा बना गया
मत भडक मेरे दिल ,
यूँ खुद पे न गुर्रा,
तू ही था नासमझ ,
जो उसे दे दिया तुर्रा
जनता ही राजा प्रजा,
मदारी और जमूरा,
ये देश है स्वतंत्र,
ये मुल्क है कंगूरा
मुझको ही पूरा करना है ,
काम अधूरा,
अब कोई पी के ना झूमे ,
सत्ता का धतूरा
फिर से जब जंग छिड़ी,
सब को हो गया देश ये प्यारा,
अब कैसे पता चलेगा ,
कौन है मदारी यहाँ कौन है जमूरा

